जनभूमि–मुंगेली/नगर में गुरुवार का दिन संकटमोचन हनुमान जी की भक्ति के नाम रहा। चारों ओर ‘जय श्री राम’ और ‘जय हनुमान’ के जयघोष सुनाई दे रहे थे। मंदिरों में विधि-विधान से पूजा-अर्चना हुई,जगह-जगह भंडारे आयोजित किए गए और पूरा शहर भक्ति रस में सराबोर नजर आया। लेकिन, इसी भक्ति के बीच एक ऐसी तस्वीर भी सामने आई जिसने धर्मपरायण लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। हनुमान जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में निकाली गई भव्य शोभायात्रा, जो आस्था का प्रतीक होनी चाहिए थी,वह कुछ ही देर में फिल्मी गानों और शोर-शराबे के मनोरंजन में तब्दील हो गई।
भजन से शुरू हुआ सफर,’जानू मेरी जान’ पर खत्म
शोभायात्रा की शुरुआत बेहद उत्साहजनक और गरिमामय थी। श्री राम दरबार और हनुमान जी की जीवंत झांकियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थीं। लोग ढोल-ताशों की थाप पर थिरक रहे थे और माहौल पूरी तरह धार्मिक था। लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ी,अचानक भक्ति संगीत गायब हो गया और उसकी जगह “जानू मेरी जान.. मैं तेरे कुर्बान” और “तू है मेरी जिंदगी” जैसे फिल्मी गानों ने ले ली।
देखते ही देखते जो युवा कुछ देर पहले प्रभु की भक्ति में लीन दिख रहे थे, वे फिल्मी धुनों पर फूहड़ता के साथ नाचते नजर आए। आस्था का वह पवित्र मंच अचानक एक मनोरंजन रैली की तरह दिखने लगा।
क्या देवी-देवता मनोरंजन का साधन बन गए हैं?
नगर में यह नजारा पहली बार नहीं देखा गया। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इससे पहले दुर्गा विसर्जन के दौरान भी “बाप तो बाप रहेगा” और “तू मेरे सामने,मैं तेरे सामने” और “दम है तो रोक के दिखा शेखावत” जैसे गाने बजाकर शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा की विदाई की गरिमा को ठेस पहुंचाई गई थी। सवाल यह उठता है कि:
जो युवा खुद को हिंदू संस्कृति का रक्षक कहते हैं,वे ही सार्वजनिक रूप से अपनी संस्कृति का मजाक क्यों बना रहे हैं?
क्या देवी-देवता और धार्मिक उत्सव अब युवाओं के लिए केवल फूहड़ता और मनोरंजन का एक जरिया बनकर रह गए हैं?
जगतजननी और संकटमोचन के प्रति श्रद्धा क्या केवल कुछ घंटों के दिखावे तक सीमित है?
हिंदू संगठनों की चुप्पी पर सवाल
नगर के प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि इस तरह की घटनाओं से सनातन संस्कृति की छवि धूमिल होती है। जब धार्मिक आयोजनों में फिल्मी गानों का तड़का लगाया जाता है, तो वह आयोजन की पवित्रता को समाप्त कर देता है। ऐसे में हिंदू संगठनों और आयोजन समितियों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का मत: “धार्मिक यात्राओं का उद्देश्य आध्यात्मिक चेतना जगाना होता है, न कि फिल्मी गानों पर शक्ति प्रदर्शन करना। यदि आयोजक इन पर नियंत्रण नहीं रखते, तो यह भविष्य में नई पीढ़ी को गलत संदेश देगा।”
निगरानी की सख्त जरूरत
नगर में चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर क्यों इन शोभायात्राओं में डीजे और धुमाल पर बजने वाले गानों की सूची पहले से तय नहीं की जाती? अपनी संस्कृति का उपहास उड़ाने वाली इन हरकतों पर लगाम लगाने के लिए समाज के वरिष्ठ जनों और हिंदू संगठनों को आगे आकर सख्त नियम बनाने होंगे,ताकि भविष्य में ‘शोभायात्रा’ के नाम पर ‘फूहड़ता’ का प्रदर्शन न हो सके।

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