जनभूमि–मुंगेली/नगर में इन दिनों अव्यवस्थाओं का ऐसा जाल बुना जा चुका है कि आम नागरिक खुद को ठगा सा महसूस कर रहा है। नगर की सड़कें,जो कभी सुगम यातायात का माध्यम हुआ करती थीं,अब व्यापारियों के ‘निजी गोदाम’ और ‘डिस्प्ले सेंटर’ में तब्दील हो गई हैं। विडंबना देखिए कि जिस सड़क पर नगर पालिका और प्रशासन का नियंत्रण होना चाहिए,वहां अब दुकानदारों की मर्जी चलती है। आलम यह है कि राहगीरों को समझ ही नहीं आता कि वे सड़क पर चल रहे हैं या दुकान के भीतर।
मैप में सड़के 20 फीट की,लेकिन जमीन पर मात्र गली
नगर के प्रमुख व्यापारिक केंद्र अब किसी भूलभुलैया से कम नहीं हैं। सिंधी कॉलोनी चौक से शंकर मंदिर मार्ग,पड़ाव चौक से बलानी चौक और पुराना बस स्टैंड से रामानुज द्वार होते हुए गोल बाजार जाने वाला मार्ग—ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहां सरकारी दस्तावेजों में सड़क की चौड़ाई 20 से 25 फीट दर्ज है। लेकिन धरातल पर स्थिति यह है कि व्यापारियों ने अपनी दुकान का सामान 5 से 10 फीट बाहर तक फैला दिया है। चूड़ी लाइन से बलानी चौक तक का हिस्सा तो अब महज एक पतली गली की तरह नजर आता है,जहां दो पैदल यात्रियों का एक साथ गुजरना भी दूभर हो गया है।
लाखों का व्यापार,पर सड़क बन गए ‘शोरूम’
एक तरफ व्यापारी लाखों रुपए खर्च कर बड़े-बड़े शोरूम और दुकानें संचालित कर रहे हैं,लेकिन उनकी व्यावसायिक भूख इतनी है कि दुकान के भीतर पर्याप्त जगह होने के बावजूद अधिकांश सामान सड़क पर ही प्रदर्शित किया जाता है। इससे न केवल रास्ता संकरा होता है,बल्कि दुकानों पर आने वाले ग्राहक भी अपनी मोटरसाइकिलें और कारें बीच सड़क पर खड़ी कर देते हैं। इस “डबल अतिक्रमण” की वजह से नगर के हृदय स्थल में हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है।
पार्किंग विहीन होटल और बैंकों की मनमानी
सड़क को घेरने की इस होड़ में केवल छोटे व्यापारी ही नहीं,बल्कि बड़े संस्थान भी पीछे नहीं हैं। नगर के प्रमुख होटल और कई निजी व सरकारी बैंक बिना किसी पार्किंग व्यवस्था के संचालित हो रहे हैं। इन संस्थानों में आने वाले सैकड़ों लोग अपने वाहन सड़क पर ही बेतरतीब ढंग से खड़े करते हैं। जब सड़क का एक बड़ा हिस्सा पार्किंग बन जाए,तो यातायात का दबाव बढ़ना लाजमी है। रही-सही कसर ठेला और सब्जी विक्रेताओं ने पूरी कर दी है। मार्ग के हर मोड़ पर इनके कब्जे हैं,और यदि कोई सजग नागरिक इन्हें टोकने की हिम्मत करे,तो ये विवाद और मारपीट पर उतारू हो जाते हैं।
प्रशासन का ‘इतिश्री’ कल्चर:26 मार्च का वो बेनतीजा निरीक्षण
जनता की शिकायतों के बाद बीते 26 मार्च को भारी लाव-लश्कर के साथ एसडीएम,नजूल अधिकारी,नगर पालिका सीएमओ और तहसीलदार की टीम सड़कों पर उतरी थी। पुराना बस स्टैंड से लेकर पंडरिया रोड तक अधिकारियों ने मार्च किया,व्यापारियों को कड़ी फटकार लगाई और ‘अंतिम चेतावनी’ दी। लोगों को लगा था कि अब बदलाव आएगा, लेकिन नतीजा सिफर रहा। निरीक्षण के चंद घंटों बाद ही स्थिति जस की तस हो गई। प्रशासन की यह “चेतावनी वाली कार्यशैली” अब जनता के बीच मजाक बन चुकी है।
शहर के अंदर मुख्य मार्ग पर शाम 5 बजे से रात 10 बजे तक सभी चार पहिया वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित, रोड डाइवर्ट होने से लोगों को अपने घर तक पहुंचने के लिए करीब 2 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है, जिससे आमजन को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
रसूखदार नेताओं का ‘कवच’ और बेबस अधिकारी
इस पूरी समस्या की जड़ में एक कड़वा सच ‘राजनीतिक संरक्षण’ भी है। लोगों के मुताबिक,जब भी प्रशासन किसी बड़े अतिक्रमणकारी पर कार्रवाई का मन बनाता है,तो अधिकारियों के फोन की घंटी बज उठती है। सत्तापक्ष और रसूखदार नेताओं के फोन आते हैं कि “फलां आदमी मेरा परिचित है, उस पर हाथ न डाला जाए।”यही कारण है कि ईमानदार अधिकारी भी दबाव में आकर सिर्फ खानापूर्ति (निरीक्षण) कर अपनी जिम्मेदारी की ‘इतिश्री’ कर लेते हैं।
मुंगेली नगर की यह समस्या अब केवल यातायात की नहीं,बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी का प्रतीक बन गई है। यदि जल्द ही ‘रसूख के फोन’ को नजरअंदाज कर भारी जुर्माने और सामान जप्ती जैसी बड़ी कार्यवाही की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई,तो वह दिन दूर नहीं जब नगर की सड़कें पूरी तरह बंद हो जाएंगी और आम आदमी अपने ही शहर में बंधक बन जाएगा।

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