जनभूमि–मुंगेली/छत्तीसगढ़ की राजनीति अब केवल घोषणाओं और योजनाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि “छत्तीसगढ़िया पहचान” की लड़ाई बन चुकी है। यही वजह है कि प्रदेश की सियासत की सड़क पर आज भी कांग्रेस और विशेष रूप से भूपेश बघेल का प्रभाव महसूस किया जा रहा है।
यह मानने से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपने कार्यकाल में उन्होंने छत्तीसगढ़ी संस्कृति, तीज-त्योहार, लोकभाषा और “छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान” को राजनीति के केंद्र में लाने का काम किया।

कांग्रेस के वरिष्ट पार्षद अरविंद वैष्णव ने कहा कि बीजेपी लगातार प्रयासों के बावजूद अभी तक खुद को जनता के मन में पूरी तरह “शुद्ध छत्तीसगढ़िया” छवि के रूप में स्थापित नहीं कर पाई है। शायद यही कारण है कि प्रदेश के एक बड़े वर्ग को आज फिर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की शैली और सांस्कृतिक जुड़ाव याद आने लगा है।
कल मुंगेली में मुख्यमंत्री द्वारा संत गुरु घासीदास, महाराणा प्रताप, माता कर्मा और डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमाओं का अनावरण किया गया। कार्यक्रम भव्य रहा, मंच विशाल था और राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट था।
लेकिन इसी दौरान पास में स्थापित छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा पर मुख्यमंत्री की नजर नहीं पड़ी — या शायद स्थानीय नेताओं ने उसका स्मरण कराना जरूरी नहीं समझा। अब यही बात शहर और राजनीतिक गलियारों में दबी जुबान से चर्चा का विषय बन गई है।
जब बात छत्तीसगढ़ की हो, तो छत्तीसगढ़ महतारी को नज़रअंदाज़ कैसे किया जा सकता है?
इधर जिले की एक और पुरानी मांग रेल सुविधा भी अब लोगों के धैर्य की परीक्षा लेने लगी है। बहुत वर्षों से मुंगेली को रेल से जोड़ने की बातें होती रही हैं, सर्वे और प्रस्तावों की खबरें आती रही हैं, लेकिन आज तक कोई ठोस जवाब या स्पष्ट रोडमैप सामने नहीं आया।
स्थिति यह हो गई है कि अब यह मुद्दा गंभीर जनचर्चा से ज्यादा व्यंग्य का विषय बन चुका है। लोगों के बीच तंज सुनाई देने लगा है ।
“मुंगेली को रेल मिलने की खबर हर चुनाव में आती है, बस ट्रेन ही नहीं आती।”
जनता मानती है कि सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह रेल कनेक्टिविटी भी विकास की मूल आवश्यकता है, लेकिन इसे अब तक सिर्फ आश्वासनों में उलझाकर रखा गया। यही वजह है कि अब मुंगेली में विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का फर्क लोगों को साफ दिखाई देने लगा है।

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